मनोज चौरसिया, भोपाल। होलिका दहन पर पेड़ न कटें और पर्यावरण सुरक्षित रहे, इसलिए राजधानी में ज्यादातर जगहों पर गो-काष्ठ से होलिका दहन किया गया। आठ सालों से लगातार शहर में गो-काष्ठ से होलिका दहन का चलन लगातार बढ़ रहा है। इस साल होलिका दहन को लेकर अभी तक करीब 5 हजार क्विंटल से ज्यादा गो-काष्ठ बिक चुका है। जबकि इस साल गो-काष्ठ संवर्धन एवं पर्यावरण संरक्षण समिति ने साढ़े पांच हजार क्विंटल गो-काष्ठ बेचने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
पहली बार समिति को सीहोर, विदिशा, होशंगाबाद से भी गो-काष्ठ की डिमांड मिली है। समिति के अध्यक्ष अरुण चौधरी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए बाहर भी गो-काष्ठ भेजा गया है।
पर्यावरण अनुकूल : गो-काष्ठ से होली जलाने से हानिकारक धुआं और कार्बन का उत्सर्जन लकड़ी की तुलना में कम होता है।
पेड़ों की रक्षा : यह होलिका दहन के लिए लकड़ियों की मांग को कम करता है, जिससे हजारों पेड़ कटने से बच जाते हैं।
आध्यात्मिक महत्व : गो-काष्ठ जलने पर कीटाणुओं को नष्ट करता है, वातावरण को शुद्ध करता है और सनातन परंपरा के अनुसार यह शुभ माना जाता है।
गोशालाओं का सहयोग : गो-काष्ठ गोशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मदद करता है।
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2019 में जहां होली पर 2500 क्विंटल गो-काष्ठ बिका था, वहीं 2026 में ये आंकड़ा 5270 क्विंटल हो गया। इसके अलावा इन सालों में लगातार होली पर लकड़ी की मांग कम होती गई। गो-काष्ठ संवर्धन एवं पर्यावरण संरक्षण समिति के समन्वयक मम्तेश शर्मा का कहना है कि 8 साल में 31 हजार क्विंटल गो-काष्ठ का उपयोग हो चुका है। आरा मशीन संचालक रिजवान खान के मुताबिक उनकी आरा मशीन पर होली के तीन दिन पहले से लकड़ी की डिमांड बढ़ जाती थी। आज की स्थिति में यह मांग न के बराबर है। लोग बस पूजा के लिए लकड़ी ले जाते हैं। इस साल सभी आरा मशीनों से करीब 70 क्विंटल लकड़ी बिकी।
[quote name="Bhanu Mishra" quote="निकलो गलियों में बना के टोली, भिगा दो आज हर एक की झोली," st="quote" style="2"]
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2019 में जहां होली पर 2500 क्विंटल गो-काष्ठ बिका था, वहीं 2026 में ये आंकड़ा 5270 क्विंटल हो गया। इसके अलावा इन सालों में लगातार होली पर लकड़ी की मांग कम होती गई। गो-काष्ठ संवर्धन एवं पर्यावरण संरक्षण समिति के समन्वयक मम्तेश शर्मा का कहना है कि 8 साल में 31 हजार क्विंटल गो-काष्ठ का उपयोग हो चुका है। आरा मशीन संचालक रिजवान खान के मुताबिक उनकी आरा मशीन पर होली के तीन दिन पहले से लकड़ी की डिमांड बढ़ जाती थी। आज की स्थिति में यह मांग न के बराबर है। लोग बस पूजा के लिए लकड़ी ले जाते हैं। इस साल सभी आरा मशीनों से करीब 70 क्विंटल लकड़ी बिकी।
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2019 में जहां होली पर 2500 क्विंटल गो-काष्ठ बिका था, वहीं 2026 में ये आंकड़ा 5270 क्विंटल हो गया। इसके अलावा इन सालों में लगातार होली पर लकड़ी की मांग कम होती गई। गो-काष्ठ संवर्धन एवं पर्यावरण संरक्षण समिति के समन्वयक मम्तेश शर्मा का कहना है कि 8 साल में 31 हजार क्विंटल गो-काष्ठ का उपयोग हो चुका है। आरा मशीन संचालक रिजवान खान के मुताबिक उनकी आरा मशीन पर होली के तीन दिन पहले से लकड़ी की डिमांड बढ़ जाती थी। आज
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